एक दौर था जब पत्रकार का नाम इज्जत से लिया जाता था..और कभी कभी तो पत्रकार साहब भी बोल दिया जाता था..पत्रकार का काम भी सेना से कम नहीं हुआ करता था..पत्रकार मतलब कलम के सिपाही..ये नाम इसी लिए तो दिया गया था…सच दिखाने के लिए जी जान लगानी पड़ती थी..भारत की आज़ादी में भी पत्रकार की भागेदारी अहम् रही है और इस बात को नकारा नहीं जा सकता..

लेकिन अब हालात बदल चुके हैं…जरुरत बदल चुकी है..अब आज़ाद होकर भी हम आज़ाद नहीं और हमें आज़ादी चाहिए भी नहीं..हम किसी के इशारे पर ही दौड़ना चाहते हैं वो इस लिए क्युकी इसमें आसानी ज्यादा रहती है..और जान का खतरा भी नहीं…

अगर मेरे पास भी 4-5 न्यूज चैनल और 3-4 अखबार हो तो मैं हर साल एक बहुत बड़ा नेता तैयार कर सकता हूँ और उसी की हवा बना सकता हूँ..और उसी हवा में दिल्ली तक के लोगों के आसियाने उड़ा सकता हूँ..

जिस देश में सेना पत्थर खा रही हो..किसान आत्महत्या करने से पहले मूत पी रहा हो, नक्सली हमले में 24 घर बर्बाद हो गए हों, वो सब मीडिया को कम ही दिखता है या शायद थोडा धुंधला दिखता है ..उस देश में हम बात करते पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक की…जिस देश में सेना खुद पत्थर खा रही हो वो क्या सर्जिकल स्ट्राइक करेगी…और मीडिया ने इस सर्जिकल स्ट्राइक को ऐसे दिखाया कि कोई विश्व युद्ध जीत लिया हो..

और सबसे ज्यादा हंसी तब आती है जब भारत की किसी ऐसे देश के साथ तुलना की जाती है जो हमसे कही ज्यादा संपन्न हैं..ये उसी तरह है जैसे अपने घर में पानी टपक रहा है…लेकिन छज्जे पर खड़े होकर दुसरे के घर की शानदार पुताई बहुत लुभावनी लगती है…
मीडिया अब दिल्ली सरकार की तरह लोगों के दिलों से भी उतरता जा रहा है..कोई विश्वास करने को राजी नही ..लोगों के इस खोये विश्वास को पाने के लिए बहुत जिद्दो जहद होगी और वो कोई भी मीडिया संस्थान करना नहीं चाहता…और जो करने की कोशिश भी करता हो उसके मुह पर देशद्रोही की पट्टी बाँधने का काम शुरू हो जाता है…

Advertisements